औरंगज़ेब: ज़ालिम या आदिल?

औरंगज़ेब: ज़ालिम या आदिल?

ग़ुलाम मुस्तफ़ा नईमी
रौशन मुस्तक़बिल, दिल्ली

करीब एक महीने पहले एक प्रोपेगेंडा फिल्म रिलीज़ हुई, जिसमें मुग़ल शहंशाह औरंगज़ेब आलमगीर को बेहद ज़ालिम और सख़्त दिल बादशाह के तौर पर पेश किया गया। डायरेक्टर ने मराठा सरदार संभाजी की मौत को बेहद दर्दनाक तरीके से फ़िल्माया। प्रोपेगेंडा स्क्रिप्ट, दर्दनाक फ़िल्मांकन और सरकार की प्रचार नीति ने फिल्म के मक़सद को पूरा कर दिया। फिल्म के रिलीज़ होते ही औरंगज़ेब पर बहस छिड़ गई। प्रोपेगेंडा का असर इतना हुआ कि कुछ कट्टरपंथी उनकी क़ब्र तोड़ने और उस पर शौचालय बनाने की मांग करने लगे। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कभी भी उनकी क़ब्र पर हमला हो सकता है।

औरंगज़ेब का तौर-तरीक़ा

औरंगज़ेब आलमगीर सख़्त उसूल पसंद और इंसाफ़ पसंद शहंशाह थे। उन्होंने अपने दुश्मनों के साथ भी इंसानियत और फ़याज़ी का सुलूक किया। छत्रपति शिवाजी को तमाम दुश्मनी के बावजूद एक नहीं बल्कि दो बार अमान दी। और उन्हें पांच हज़ारी ओहदे से नवाज़ा।

1665 में हुए पुरंदर समझौते के तहत शिवाजी ने अपने बेटे संभाजी को भी मुग़ल सरकार के हवाले कर दिया था। संभाजी ने एक साल मुग़ल सरपरस्ती में गुज़ारा। इस दौरान औरंगज़ेब ने उन्हें सात साल की उम्र में ही पांच हज़ारी ओहदा देकर शिवाजी की इज़्ज़त का ख़याल रखा।

संभाजी की उम्र 21 साल थी, जब उनके पिता ने नाराज़ होकर उन्हें पन्हाला क़िले में क़ैद कर दिया। संभाजी किसी तरह भाग निकले लेकिन एक मजबूत पनाहगाह की तलाश में थे। ऐसे में औरंगज़ेब ही उनकी मदद को आए। उन्होंने संभाजी को पनाह दी, सात हज़ारी ओहदा दिया और फ़ौज में शामिल कर लिया। इसी दौरान संभाजी ने अपने पिता शिवाजी के ख़िलाफ़ 1679 की भूपालगढ़ लड़ाई में मुग़ल सैनिक के तौर पर हिस्सा लिया।

इतने एहसान के बावजूद संभाजी कुछ दिनों बाद फिर शिवाजी से जा मिले। शिवाजी की मौत के बाद संभाजी ने मुग़लों के ख़िलाफ़ छापामार जंग छेड़ दी और करीब आठ साल तक लूटपाट कर सल्तनत को भारी नुक़सान पहुंचाया। आख़िरकार, मुग़लों को उनकी तरफ़ ध्यान देना पड़ा, जिसके नतीजे में संभाजी की गिरफ़्तारी और मौत हुई।

संभाजी की मौत के बाद उनके बेटे शाहू जी की परवरिश भी मुग़ल सल्तनत ने ही की। उनकी पत्नी येसुबाई को भी बड़े एहतराम के साथ रखा गया। शाहू जी ने करीब 18 साल तक मुग़ल सरपरस्ती में गुज़ारा और वहीं जवान हुए।

इतनी तफ़्सील के बाद यह सवाल उठता है कि अगर औरंगज़ेब इतने ही सख़्त दिल और मज़हबी तौर पर मुतअस्सिब (कट्टर) होते, तो संभाजी को दो बार ओहदा और इज़्ज़त देने की क्या ज़रूरत थी?
संभाजी की मौत के बाद उनके बेटे की परवरिश क्यों की?
आख़िर कौन इंसान अपने दुश्मन के बेटे को 18 साल तक पालता है?
कौन अपने दुश्मन की पत्नी को बहन जैसी इज़्ज़त से रखता है?

ये तमाम हक़ीक़तें आज भी औरंगज़ेब के इंसाफ़ और बुलंद किरदार की गवाही देती हैं, जिसे इतिहास से मिटाना मुमकिन नहीं।

संभाजी के बेटे का तौर-तरीक़ा

संभाजी की मौत के बाद उनकी पत्नी येसुबाई और बेटे शाहू जी को मुग़ल निगरानी में लिया गया। इसके बावजूद औरंगज़ेब ने उनके साथ रहम-दिली और शफ़क़त का रवैया अपनाया।

यही वजह थी कि शाहू जी महाराज सारी ज़िंदगी औरंगज़ेब आलमगीर के क़दरदान रहे। उनके इंतक़ाल के बाद भी वे उनकी क़ब्र पर सलाम करने हाज़िर होते और अकीदत के फूल पेश करते थे। उन्होंने सतारा में औरंगज़ेब की बेटी ज़ीनत-उन-निसा बेगम के नाम पर बेगम मस्जिद भी तामीर कराई, जो आज भी औरंगज़ेब के मुख़ालिफ़ों के लिए एक करारा जवाब है।

अपने बाप के क़ातिल की क़ब्र पर फूल चढ़ाना आसान काम नहीं है। मगर शाहू जी औरंगज़ेब की इंसाफ़ पसंदी और किरदार को अपनी आंखों से देख चुके थे, इसीलिए उनके दिल में औरंगज़ेब के लिए मुहब्बत थी।

मौजूदा हालात में क्या करें?

हालात की संगीनियां इस बात का तक़ाज़ा करती हैं कि दो मोर्चों पर काम किया जाए:

क़ानूनी कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम मुख़ालिफ़ मुद्दों को लेकर एक रिट दायर की जाए और अदालत से तफ़्सीली सुनवाई और मुकम्मल हल की गुज़ारिश की जाए। अदालत को बताया जाए कि मामला सिर्फ़ किसी क़ब्र, मस्जिद या जायदाद का नहीं है, बल्कि पूरी क़ौम निशाने पर है। इसलिए मुसलमानों को भी SC/ST एक्ट की तरह क़ानूनी तहफ़्फ़ुज़ दिया जाए।
सियासी कार्रवाई: कुछ अहम शख़्सियतें वज़ीर-ए-आज़म से मुलाक़ात करें और मुस्लिम मुख़ालिफ़ता के बढ़ते रुजहान को लेकर उनसे दख़ल की अपील करें। अक्सर मौक़ों पर वज़ीर-ए-आज़म की ख़ानकाही और समाजी शख़्सियतों से मुलाक़ात होती रहती है। क्यों न इस बार उनसे मिलकर क़ौमी जज़्बे के साथ हालात की संगीनियों से आगाह कराया जाए?
अख़्तिताम पर:
क़ौम को इज़्ज़त और वक़ार के साथ जीने के लिए मेहनत करना ज़रूरी है। मेहनत करने वाले एक दिन ज़रूर कामयाब होते हैं।

दिल ना-उमीद तो नहीं, नाकाम ही तो है
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19 रमज़ान-उल-मुबारक 1446 हिजरी
20 मार्च 2025, बृहस्पतिवार

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